आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर भारत में स्वदेशी की गूँज
महीना अगस्त का ही था, तारीख 7 थी, ठीक 120 साल पहले, कलकत्ता के टाउन हॉल में एक सभा का आयोजन किया गया था। ब्रिटिश हुकूमत द्वारा घोषित बंगाल के विभाजन को लेकर लोगों में आक्रोश था। ब्रिटिश वस्तुओं और संस्थाओं के बहिष्कार का प्रस्ताव सभा में पारित किया गया, साथ ही स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने और घरेलू उद्योगों को पुनर्जीवित करने के लिए व्यापक आंदोलन करने का निर्णय लिया गया। 1905 में, यहीं से औपचारिक शुरूआत हुई स्वदेशी आंदोलन की, जो भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष में पहला संगठित जनांदोलन था, और जो देश में बाद के दशकों में हुए आंदोलनों का आधार बना।
भारत में ब्रिटिश राज के लगभग 200 वर्षों के दौरान अंग्रेज़ों द्वारा ब्रिटिश साम्राज्य के इस सबसे बड़े उपनिवेश के संसाधनों का खूब दोहन किया गया, और यहाँ से अर्जित की जा रही आय लगातार इंग्लैंड भेजी जाती रही। कभी अत्यन्त समृद्ध देशों में गिना जाने वाला भारत, बीसवीं सदी के आरंभ तक, ब्रिटिश सरकार की शोषणकारी आर्थिक नीतियों के परिणामस्वरूप इंग्लैंड को कच्चे माल का आपूर्तिकर्ता और वहाँ से आयातित तैयार माल का उपभोक्ता बनकर रह गया था। देश के पारंपरिक घरेलू उद्योगों की दशा शोचनीय हो चुकी थी। अतः स्वदेशी आंदोलन में ब्रिटिश उद्योगों द्वारा निर्मित सभी वस्तुओं, जैसे मैनचेस्टर में बने कपड़े और लिवरपूल के नमक, के बहिष्कार पर ज़ोर दिया गया, और देश में ही बनी वस्तुओं को खरीदने और उनका इस्तेमाल करने को प्रोत्साहित किया गया।
स्वतंत्रता संघर्ष के समय ‘स्वदेशी’ के आदर्श ने जनमानस को प्रेरित कर देश भर में राष्ट्रीय चेतना को जागृत करने का कार्य किया था। आज, इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में भी, जब भारत 79वां स्वतंत्रता दिवस मनाने जा रहा है, इस आदर्श ने अपनी प्रासंगिकता खोई नहीं है। “जो कोई वस्तु हम खरीदें, हमें खुद से सवाल करना होगा, क्या इसे बनाने में एक भारतीय ने परिश्रम किया है? अगर इस वस्तु को बनाने में एक भारतीय ने पसीना बहाया है , अगर यह किसी भारतीय के कौशल से बनी है, तो वह वस्तु, वह उत्पाद हमारे लिए स्वदेशी है।” हाल ही में काशी की एक जनसभा में प्रधानमंत्री मोदी ने स्वदेशी का एक बार फिर आह्वान किया। 2 अगस्त को अपने इस सम्बोधन में उन्होंने देशवासियों को सचेत किया कि वर्तमान समय में वैश्विक अर्थव्यवस्थाएं अनिश्चितता का सामना कर रही हैं, अस्थिरता से जूझ रही हैं, और ऐसे में सभी देशों का ध्यान सिर्फ अपने हितों पर है। उन्होंने आगाह किया कि भारत, जो दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के पथ पर अग्रसर है, को भी अपनी आर्थिक प्राथमिकताओं को लेकर सचेत रहना होगा। व्यापारियों और दुकानदारों से एक विशेष अपील करते हुए प्रधानमंत्री ने उनसे देश में निर्मित उत्पादों को बेचने का संकल्प लेने के लिए कहा, और देश की जनता से आग्रह किया कि वह स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग को प्राथमिकता दे। “प्रत्येक कार्य में स्वदेशी का भाव हमारा भविष्य तय करेगा ।” यह प्रधानमंत्री मोदी ने कहा।
ग्लोबलाइज़ेशन और फ्री ट्रेड के दौर में, प्रधानमंत्री ने स्वदेशी अपनाने पर ज़ोर क्यों दिया, इसकी कुछ ठोस वजहें हैं, जिन पर विचार करने की ज़रूरत है — एक वजह तो यह कि इससे स्थानीय उद्योगों में निर्मित उत्पाद को देश के भीतर बाज़ार मिलता है। बाज़ार में मांग होने से जहाँ एक ओर इन स्थानीय उद्योगों को लाभ होता है, वहीं दूसरी ओर इनके द्वारा देश में रोज़गार के नये अवसरों का सृजन भी होता है। अभी हाल ही में अमेरिका द्वारा भारत से आयातित वस्तुओं पर टैरिफ लगा दिए जाने की खबर सामने आई, यानी अमेरिका के बाज़ार में इन वस्तुओं को महँगा कर दिया गया। स्पष्ट है, ज़्यादा दाम होने के कारण इन वस्तुओं की मांग अमेरिका के बाज़ार में कम होगी ही। अगर स्वदेश निर्मित इन वस्तुओं की मांग भारतीय बाज़ारों में बढ़े तो अमेरिकी टैरिफ से भारतीय उद्योगों पर पड़ने वाला नकारात्मक प्रभाव शायद किसी हद तक कम हो सकता है।
आज की परिस्थितियों में हर देश यह प्रयास करता है कि किसी अन्य देश को उसका निर्यात अधिक जबकि वहाँ से आयात कम हो, और यदि आयात निर्यात से अधिक हो भी जाय तो यह व्यापारिक असंतुलन कम से कम हो। भारत-चीन के द्विपक्षीय व्यापार की बात करें तो चीन के साथ भारत का व्यापारिक असंतुलन इस समय अपने रिकॉर्ड स्तर पर है, यह करीब 100 बिलियन डॉलर तक जा पहुँचा है, जो चिंता का विषय है। इसका सीधा सा मतलब है कि भारतीय बाज़ारों में चीनी उत्पादों के स्वदेशी विकल्प या तो मौजूद नहीं हैं या फिर वे प्रतिस्पर्धा में टिक नहीं पा रहे। इसीलिए ज़रूरी है कि नई उन्नत तकनीकों से युक्त बेहतर गुणवत्ता वाले सस्ते स्वदेशी उत्पाद भारतीय बाज़ारों में अधिक से अधिक संख्या में उपलब्ध हों।
स्वदेशी अपनाने का अर्थ विश्व से कट जाना नहीं है, आत्मनिर्भरता प्राप्त करना है। आज के संदर्भ में इसका अर्थ विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार नहीं है, बल्कि स्थानीय उद्योगों, लघु व कुटीर उद्योगों को सहारा देना, उनका उत्पादन बढ़ाना, और देश में उद्यमिता को प्रोत्साहित करना इसका उद्देश्य है।
शुभ्र आत्रेय
कॉन्टेंट राइटर
आई० टी० डिपार्टमेंट
सुभारती विश्वविद्यालय

