तथागत बुद्ध की जीवन गाथा व शिक्षाओं को लोक संस्कृति से जोड़ता सुभारती बुद्ध मेला

तथागत बुद्ध की जीवन गाथा व शिक्षाओं को लोक संस्कृति से जोड़ता सुभारती बुद्ध मेला

तथागत बुद्ध की जीवन गाथा व शिक्षाओं को लोक संस्कृति से जोड़ता सुभारती बुद्ध मेला

मनुष्य के असंख्य दुखों का कारण क्या है, क्या सांसारिक दुखों से मुक्ति संभव है, परम सत्य क्या है; कुछ ऐसे ही मूल प्रश्नों के उत्तर की खोज में आज से लगभग ढाई हज़ार वर्ष पूर्व सिद्धार्थ राजगृह का त्याग कर संन्यास के दुर्गम पथ पर बढ़ चले थे। इतिहास में यह पहली बार था, जब कोई राजकुमार अपने परिवार एवं समस्त राजकीय वैभव को त्यागकर मानवमात्र के दुखों के निवारण का मार्ग खोजने निकल पड़ा। पीड़ित मानवता को दुखों से त्राण दिलाने का महत् संकल्प लेकर, अर्द्धरात्रि के घोर अन्धकार में, ऐश्वर्यपूर्ण जीवन और प्रियजनों का साथ सदा के लिए त्यागकर, दृढ़ निश्चय कर, सिद्धार्थ संन्यासी जीवन के कंटकपूर्ण मार्ग पर चल दिए थे। वर्षों के कठिन संघर्ष, त्याग और तपस्या से अंततः उन्होंने मनुष्य के क्लेश का कारण व उससे मुक्ति का उपाय जाना। सर्वोच्च ज्ञान प्राप्त कर वे सिद्धार्थ से ‘बुद्ध’ हो गये।

धार्मिक जड़ता व रूढ़ियों से ग्रसित तत्कालीन समाज में गौतम बुद्ध नवजागरण का संदेश लेकर आये थे। उनकी चिंतनधारा ने जनमानस में नवीन आध्यात्मिक चेतना का संचार किया। श्रेष्ठ जीवन मूल्यों पर आधारित उनके दर्शन को समझने के लिए गूढ़ रहस्यवादी विश्लेषण की ज़रूरत नहीं थी। किसी जटिल दार्शनिक चिंतन में ना उलझाकर, बुद्ध ने लोगों को बताया कि कैसे वे अपनी सांसारिक समस्याओं का समाधान कर सकते हैं। बुद्ध का बताया मार्ग मध्यम मार्ग है — घोर तपस्या और विषयासक्ति के मध्य का मार्ग। अलौकिक शक्तियों की बजाय बुद्ध ने लोगों को बुद्धि और तर्क के आधार पर समझाने का प्रयत्न किया। उन्होंने कहा कि लोग किसी शिक्षा को केवल इसलिए नहीं स्वीकार करें कि यह उनका उपदेश है, बल्कि वे उसे अपने विवेक से समझें। बुद्ध ने अहिंसा व सद्भावना की बात की, पशुओं के जीवन का भी आदर किया, जीवन की शुद्धता व सदाचार पर बल दिया।

हज़ारों वर्ष पुरानी भारतीय सभ्यता पर बुद्ध अपनी अमिट छाप छोड़ गए हैं। मनुष्य की पीड़ा के प्रति उनकी संवेदना अद्वितीय थी। बीते युगों में बुद्ध सदृश व्यक्तित्व ना तो उनके पूर्व कोई था, और ना उनके पश्चात् कोई आया। उनका एकमात्र लक्ष्य था — मानव को दुखों से मुक्ति या निर्वाण का मार्ग दिखाना। बुद्ध का यह लक्ष्य ही उनके जीवन का सार है। भारत ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व इतिहास के महापुरुष तथागत बुद्ध की जीवन-गाथा व शिक्षाओं को देश-विदेश में जन-जन तक पहुँचाने का कार्य मेरठ स्थित सुभारती विश्वविद्यालय विगत कई वर्षों से कर रहा है। इसी विराट उद्देश्य को लेकर प्रत्येक वर्ष सुभारती विश्वविद्यालय के प्रांगण में सुभारती बुद्ध मेला आयोजित किया जाता रहा है।

नदी का किनारा हो या किसी त्योहार का अवसर, फसल पकने का उत्सव हो या कोई धार्मिक समागम, भारत में सदियों से लगते आ रहे मेलों में देश की लोक संस्कृति की, सांस्कृतिक धरोहर की झलक मिलती है। मेले हमारे सामाजिक जीवन का महत्वपूर्ण अंग हैं। ये जीवन की एकसरता को समाप्त कर उसे प्रसन्नता से भर देते हैं। अन्य लोगों से मिलने का तथा अपनी संस्कृति को पहचानने का ये मेले सुअवसर प्रदान करते हैं। भारत की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण में मेलों की एक बड़ी भूमिका रही है। समाज को जोड़ने के अलावा हमारी प्राचीन सभ्यता और परंपराओं के बारे में नई पीढ़ी को जागरूक करने में भी मेलों ने अहम भूमिका निभाई है।

हर वर्ष की भांति इस बार भी सुभारती विश्वविद्यालय के परिसर में आयोजित होने जा रहा बुद्ध मेला धर्म व संस्कृति के अद्भुत संगम जैसा होगा। इस मेले में बच्चों के झूले, खेलकूद व मनोरंजन के कार्यक्रम, विभिन्न प्रतियोगिताएं, और जलपान के स्टॉल्स हर बार की तरह आकर्षण के केंद्र होंगे। गौतम बुद्ध के जीवन और शिक्षाओं को दर्शाती चित्र प्रदर्शनी और धम्म दीप कार्यक्रम का आयोजन भी होगा। इस दौरान मेले में आने वाले आगंतुक सुभारती परिसर में ही स्थित बोधि वृक्ष, मत्स्य जल कुंड, दीपशाला, और बुद्ध विहार में भ्रमण का आनंद ले सकते हैं। इसके अतिरिक्त वे बुद्ध वंदना, बुद्ध संगीत कार्यक्रम, और धम्मपद पाठ में भी भाग ले सकते हैं। बौद्ध साहित्य सम्बन्धी पुस्तकें एवं अन्य धम्म सामग्री मेले में मौजूद स्टॉल्स पर विक्रय के लिए उपलब्ध होंगी।

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