भूली-बिसरी शौर्य गाथाओं को जीवंत करता सुभारती विश्वविद्यालय
देश की राजधानी दिल्ली को उत्तराखंड से जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग पर, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक शहर मेरठ से गुज़रते हुए, बागपत मार्ग की क्रॉसिंग से थोड़ा पहले, एक ऊँचे प्लेटफॉर्म पर शान से खड़े विशालकाय टी-55 युद्धक टैंक और बीटीआर- 60 युद्धक वाहन, यात्रियों का ध्यान बरबस अपनी ओर खींच लेते हैं। 1971 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुई जंग में बड़ी भूमिका निभाने वाले, भारतीय थल सेना की मारक क्षमता और युद्ध कौशल के प्रतीक, इंजीनियरिंग के इन बेजोड़ नमूनों को कौतूहल भरी दृष्टि से देखते हुए, द्वार संख्या 4 से होकर जब आप स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय के भीतर प्रवेश करते हैं, तो थोड़ी देर के लिए सोच में पड़ जाते हैं कि जैसे आप भारतीय सशस्त्र सेनाओं को समर्पित एक सैन्य स्मारक स्थल पर हैं।
प्रवेश द्वार के समीप ही स्थित हरे-भरे उपवन में यदि आप विचरण करें तो पाएंगे कि यहाँ हर वृक्ष जैसे एक कहानी कह रहा है, कोई साधारण कहानी नहीं, बल्कि अदम्य साहस और बलिदान की कहानी। कारगिल शहीद स्मृति उपवन में हर पेड़ 1999 के कारगिल युद्ध में अपने प्राणों का उत्सर्ग करने वाले प्रत्येक भारतीय सैनिक के सम्मान में लगाया गया है। कारगिल के शहीदों को श्रद्धांजलि देने का यह प्रयास अपने आप में अनूठा है। विश्वविद्यालय में थोड़ा और आगे बढ़े तो सामने शहीद स्मारक का भवन दिखाई पड़ता है, जहाँ स्थापित है अमर जवान ज्योति, जो आज़ाद हिन्द फ़ौज के बहादुरों और देश की सशस्त्र सेनाओं के बलिदानी वीरों को समर्पित है। दीवारों पर उकेरे गये बहुत-से चित्र भारतीय सेना के अविश्वसनीय साहसिक कारनामों को बड़े प्रभावी ढंग से दर्शाते हैं।
विश्वविद्यालय के पूरे परिसर में यदि आप भ्रमण करें तो देखेंगे कि प्रत्येक भवन, मार्ग, चौराहे, या द्वार का नाम सिर्फ एक नाम नहीं, एक इतिहास है, एक संघर्ष गाथा है। सुभारती विश्वविद्यालय ने अपने परिसर का कोना-कोना समर्पित किया है भारत के गौरवशाली इतिहास एवं स्वतंत्रता संघर्ष से जुड़े उन महान वीरों और क्रांतिकारियों को जो समय के साथ भुला दिए गए, जिनके नाम अतीत के पन्नों में कहीं खो गए, और शायद इतिहास की पाठ्य-पुस्तकों में भी जिनका ज़िक्र नहीं मिलता। सुभारती विश्वविद्यालय के संस्थापक डॉ० अतुल कृष्ण के अनुसार इस प्रयास का उद्देश्य युवाओं को भारत के गौरवशाली अतीत और स्वतंत्रता संघर्ष के वास्तविक नायकों का परिचय देना है ताकि वे देश की प्राचीन विरासत व महान संस्कृति पर गर्व करें और उससे प्रेरणा लें।
भारत के अतीत से जुड़े कुछ विषय, कुछ घटनाएं ऐसी हैं, जिनका ऐतिहासिक मूल्य अत्यधिक होने पर भी उन्हें उचित महत्व कभी नहीं दिया गया, और इसीलिए कम लोग ही इनसे परिचित हैं। पिछले कई वर्षों से सुभारती विश्वविद्यालय का प्रयास है कि इन विषयों और घटनाओं से जुड़े तथ्य जनसामान्य की जानकारी में लाये जाएं और इन पर अधिक से अधिक चर्चा हो। ऐसे कुछ उदाहरण हैं — भारत के स्वतंत्रता संघर्ष में सशस्त्र क्रांति के नायकों की भूमिका, सुभाष चंद्र बोस और उनके नेतृत्व में आज़ाद हिंद फौज द्वारा देश को स्वतंत्र कराने का प्रयास, 21 अक्टूबर 1943 को अविभाजित भारत की सरकार का गठन, 14 अप्रैल 1944 को मोइरांग में आज़ाद हिंद फौज द्वारा भारतीय झंडा फहराया जाना, 1947 में भारत के विभाजन की त्रासदी, इत्यादि।
भारत के युद्ध इतिहास का एक महत्वपूर्ण प्रकरण है — ऑपरेशन पवन, जिसका उल्लेख शायद ही कहीं होता हो। इसे भारतीय सेना के इतिहास का सबसे मुश्किल ऑपरेशन माना जाता है। 1987 में श्रीलंका का उत्तरी प्रायद्वीप जाफना भीषण गृहयुद्ध की आग में झुलस रहा था। यह युद्ध श्रीलंका के तमिल मिलिटेंट्स मुख्यतः लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (LTTE) और श्रीलंका की सेना के बीच था। तमिल संगठनों की मांग अलग तमिल राष्ट्र बनाने की थी। गृह युद्ध के कारण सैंकड़ों लोग मारे जा रहे थे और भारत आ रहे तमिल शरणार्थियों की संख्या भी बढ़ रही थी। पड़ोस में पैदा हुए इस संकट को लेकर भारत सरकार चिंतित थी। इस दौरान भारत और श्रीलंका की सरकारों के बीच एक समझौता हुआ, जिसके तहत भारत की ओर से शांति सेना या इंडियन पीस कीपिंग फोर्स (IPKF) को श्रीलंका भेजा गया, जिसका लक्ष्य जाफना को LTTE से मुक्त कराना था। 11 अक्टूबर, 1987 को IPKF ने ऑपरेशन आरंभ किया, जिसे ‘ऑपरेशन पवन’ कोड नेम दिया गया। भारतीय सेना ने अंततः जाफना प्रायद्वीप पर कब्ज़ा तो कर लिया, लेकिन इसकी कीमत उसे भारी जनक्षति से चुकानी पड़ी। ऑपरेशन पवन में लगभग 1200 भारतीय सैनिकों की शहादत हुई, और लगभग तीन से साढ़े तीन हज़ार सैनिक घायल हुए।
दुर्भाग्य से भारतीय सेना के अन्य मिलिट्री ऑपरेशन्स की तरह ऑपरेशन पवन को कभी समुचित पहचान नहीं मिली। आज करीब चार दशक बाद भी ऑपरेशन पवन के शहीद सैनिकों को उचित सम्मान नहीं मिल सका है। ऑपरेशन पवन का इतिहास व इससे जुड़े तथ्य सामने आएं, और इस दौरान हताहत हुए सैनिकों को पूरा सम्मान मिले — इस विचार का सुभारती विश्वविद्यालय समर्थन करता है और इस दिशा में यथासंभव प्रयासरत भी है। ऑपरेशन पवन के बारे में, और उन विपरीत परिस्थितियों के बारे में लोग जानें, जिनसे जूझते हुए भारत के जांबाज़ सैनिकों ने सर्वोच्च बलिदान दे दिया — इसी उद्देश्य को लेकर सुभारती विश्वविद्यालय के परिसर में, ठीक उसी दिन जब श्रीलंका के जाफना में 38 बरस पहले ऑपरेशन पवन आरंभ किया गया था, आगामी 11 अक्टूबर को, एक कार्यक्रम आयोजित होने जा रहा है।

